Friday, June 26, 2009

पाठक की राह क्या है?

किसी भी रचना, शख़्स, कहानी या लेख को अपने अतीत-आपबीती या अनुभव से बाहर किस तरह से जी सकते हैं? यानि जो रचना, कहानी या लेख हमारे अतीत- आपबीति और याद में नहीं आते उसे हम खुद में कैसे उतारते हैं या उससे कैसे जुझ पाते हैं?

एक छवि...
'एक शख़्स अपने टूटते हुए घर से दस कदम दूरी पर बैठा है। जिसका घर टूट रहा है और वो उसे देखकर रो रहा है।'

इस छवि को हम कैसे सोचेगें? जो हमारी याद और अनुभव मे नहीं आती। क्या हम उससे एक दूरी बना लेते हैं?
उससे - इतनी दूरी की जहाँ से हम उसके हर पल को देख सके मगर वो हमारे किसी भी अहसास को ना देख सके या महसूस कर सकें।

क्या हम छूपने की कोशिस करते है? उसकी हर नज़र से या तो अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं या फिर किसी मजबूत और ठोस मूरत के पीछे छुप जाते हैं। इस छूपने मे एक डर कि गुंजाइस पैदा हो चूकी होती है हमारे अन्दर जो ये देखती है की कहीं पर अगर वो हमारे से टकरा गई तो हम क्या करेगें तो इन्तजार करते हैं किसी मजबूत मूरत के आ जाने का।

क्या हम किसी कहानी को पढ़कर कई चीज़ों को पीछा या दोहरा रहे होते हैं या कुछ दूरी बना लेते हैं?
इन नज़रियो के बीच मे "पढ़ना" शब्द कैसे उभरता है? इतना तो शायद नज़र में आ ही जाता है कि पढ़ना किसी रोशनी और डर के तहत नहीं था। यहाँ पर किसी छवि, शब्द, रूप, आकार से दूरी होती है। वो खाली नज़र आने वाली इमेज़ में नहीं थी। शायद अपने से टकराने की मौज़ूदगी पर निर्भर करती है।

हम अगर खुद के आधार और आकार को छूपा दे तो सामने आने वाली इमेज़ किस तरह से नज़र आती है?
कहते है:- किसी भी पढ़े मे अपने भाव ना आये ऐसा नहीं होता । पर क्या वाकई ऐसा होता है?
एक छोटा सा खेल है अपने साथ जो हम करते है । नजदीकी-दूरी, दिखने-छूपने, अन्छूआ-छूना । ये क्या किसी पढ़ी गई कहानी, लेख, वाक्या, जीवनजर्नी या किताब के साथ होता है? कितने नजरिये और अहसास है कहानियों और लैखो को पढ़ने के?

इस सवाल की अंगनाई मे कहीं उभरता है की "पढ़ना क्या है?” वो किसी के कहे, बोले, सुनाये, लिखे, छापे ये शब्दों पर निर्भर नहीं होता या वहीं पर जमा नहीं रहता। वो तैरता है दो ख़ास तरह की जिवनियो में। किसी भी कहानी ने अपना कोई रंग का फैलाव होता है जो छवियों और रूपों में बहता है। पढ़ने वाले की अपनी कोईन कोई रंग की धारा होती है जिसे लेकर वो बहने में उतर पाता है। किसी कश्ती और बिना चप्पू के। वो बहता है, तैरता है और डूबता भी है मगर उसके बहाव से बाहर भी आ जाता है। कभी उसका रंग लेकर तो कभी अपना रंग देकर। मगर वो क्या है जो दो अलग धाराओं के दरमियाँ होता है और वो क्या है जो दो धाराओं के मिलने से बनता है?

जैसे- मान लेते हैं की काले-सफेद रंगो के मिलने से बनने वाला ग्रह कलर की तस्वीर क्या है?

पढ़ना शब्द मे ये कुछ रंग उभरते हैं। जो अपने रंग और कहानी को पढ़ने के बाद में उफान मे थे। ऐसे कई और नजरियों, दूरियाँ, मुतभेड़, छुपना और ग्रह कलर के अवशेस है हमारे बीच जो पल रहे हैं। उनकी सूची हम उभार सकते हैं। अपने पढ़ने के अहसास से।

अनुभव और अतीत की ज़ुबानी से बाहर निकलकर क्या दुनिया बयाँ कि जा सकती है? वो क्या है जो हमारे जीवन के बाहर का अहसास है? पढ़ना, किसी की कहानी उसी की जुबानी सुनना और उसमे शामिल होना ये कैसे संभावनाओ मे जीने लगता है?

लख्मी

1 comment:

ishaan said...

नमस्ते लख्मी जी।

मुझे आपका लिखा हुआ बहुत गहराई से और कुछ सिंचने वाला होता है।

पढ़ने और महसूस करने के बीच एक हल्की रेखा के बीच हम कहीं कुछ पलों के लिये रुक जाते हैं और जीते हैं उस ओझल तरलता को जो हमें अपने से अजनबी बना जाती है।