Friday, June 26, 2009

अफ़साना नामा



जगह में हर वक़्त कुछ न कुछ चलता रहता है। आप क्या पकड़ते हो उसमे ये आप पर निर्भर है की उसमे समाये जिवश्यमों को कैसे तलाशा जा सकता है। जो जीवन की अपनी भूख से अलग है। वो क्या है।

राकेश

3 comments:

ishaan said...

युगों से युग बदलते आये हैं इसका अफसोस क्या किजिये?
हाथ बढ़ाइये और सबको अपना लिजिये।

पानी जब बह निकलता है तो अपना रास्ता तलाश लेता है और ज़िन्दग़ी जब जी उठती है तो अपने साधन बना लेती है।

ishaan said...

युगों से युग बदलते आये हैं इसका अफसोस क्या किजिये?
हाथ बढ़ाइये और सबको अपना लिजिये।

पानी जब बह निकलता है तो अपना रास्ता तलाश लेता है और ज़िन्दग़ी जब जी उठती है तो अपने साधन बना लेती है।

Ek Shehr Hai said...

hello ishaan
aap ne ek shehr ko padha achchhA laga.aap se ek samvad pakar humain khoshi hoti hai.


rakesh
pks