Tuesday, January 13, 2009

अपने से बहस

हमारा "आसपास" क्या है?, क्या "आसपास" है और क्या दूर, इस समझ के पात्र क्या हैं? कुछ "आसपास" होना और दूर होने का मतलब क्या है? इसके बीच मे जुड़ाव क्या है? "आसपास" और दूर होने का फैसला हम कैसे करते हैं?

इन सवाल को लेकर मैं जहाँ पर रहता हूँ और वहाँ के बारे मे सोचता हूँ तो कई तरह की पैकिंग नज़र आती हैं। जैसे, समाज़ मे "आसपास" को बहुत तरह की पैकिंग मे रखा गया है। जिसमे हमारे रहने को, हमारे चलने को, हमारे काम करने को, हमारे काम करने के बाद मे आने वाले कल की कल्पना करने को, हमें कहाँ जाना है?, कहाँ तक पँहूचना है?... इन सूरतों में हमारे दिमाग के साथ मे हमारे शरीर की पैकिंग पहले से ही तय हो जाती है।

इसका एक उदाहरण देने की कोशिश करता हूँ, जैसे, घर का एक ढाँचा, क्या कभी उसे ध्यान से देखा है? साढ़े बाइस गज़ के मकान को रहने लायक बनाया जाता है। परिवार के सदस्य के मुताबिक उसकी कल्पना को बनावट का रूप दिया जाता है। दो लोगों का परिवार, दो बच्चो की कल्पना और मकान तैयार, उसके साथ मे बस, मिलने के लिए आने वाले लोगों कि भी कल्पना आकार पा लेती है। मगर इसको हम अगर कुछ देर के लिए भूला दे तो?, बच्चा बड़ा हुआ उसकी शादी हुई तो एक कमरा ऊपर चड़ा दिया, दूसरे की हुई तो एक और चड़ा दिया। ये भी वहाँ तक होता है जहाँ तक पैकिंग की संभावनाये होती है। वे भी जायज़ संभावनाये। अगर ये नहीं हो पाता तो उस घर के ढाँचे मे एक और जगह जुड़ जाती है। और पैकिंग के लिए वे भी तैयारी के लिए मौज़ूद है।

ये सोच हमारे संदर्भ मे क्या करती है? हमारे बीच मे ये उपजाऊ है या नहीं?

अभी तक हमारे लिए "आसपास" कई तरह की विशेषताओ से भरा है। मैं कहता हूँ हमारे बीच मे "आसपास" को खुलते, सींचते, उठाते, कहानी कहते, भूल जाते और याद करते हुए देखा है। उसके साथ-साथ उसमे खुद के रॉल को भी बखूबी महसूस किया है। इस दायरे मे ज़्यादातर "आसपास" हमारे अपने रहन-सहन, माहौल से सीधा बातचीत मे रहा है। जो कभी कुछ बोलता है तो कभी गूंगा है। हम जहाँ पर खड़े हुए बस, आसपास वहीं से बयाँ होता है। जो कभी-कभी किसी सूरत मे महज़ एक शब्द की ही भांति दोहराया गया है।

मैं कोशिश कर रहा था "आसपास" को "दूरी" से लिखने व सोचने की। यानि के हमसे दूर क्या है? वे क्या है जिसे हम दूर कहतें हैं? किससे दूरी मे रहते हैं? दूरी को बताने के लिए हमारे पास क्या सवाल हैं और क्या तस्वीरें हैं?

एक आदमी से मैंने पूछा तो वे बोला, "कुछ चीज़ें दूर होती हैं। जहाँ तक हम पँहूच नहीं सकते, कुछ चीज़ों तक पँहूचने की हमारी औकात नहीं होती। बाकि सब तो हमारे आसपास ही है।"

इस ज़ुबान से हम क्या सोच सकते हैं? समाज़ नज़दीकी बोलने के लिए उसका विलोम शब्द अपने हाथ मे रखता है। ये क्रिया क्या है?

"आसपास" से "दूरी" तक को सोचना व सींच पाना।

मुझे लगा ये सोचते हुए की हमें हमारे रियाज़ मे कुछ परिवर्तन लाने होगें। हमारी नज़र, हमारी ज़ुबान और चीज़ें पकड़ने का काँटा सभी को एक ही तरह की आदत पड़ जाती है। जब हम एक ही लय मे लम्बा चलते हैं। हमारे दायरे भले ही फैलाव मे हो लेकिन वे रास्ते हमारे अन्दाजेभर ही होते हैं। अपने आपको किरॉस चैक करना शायद अपनी जगह नहीं बना पाता हमारे अन्दर।

"विलोम शब्द" या "विलोम रूप" की तरह से देखना उसी कार्य को समपन्न करता है।

विलोम शब्द को हम क्या मानते हैं? जब बचपन मे ये सिखाया जाता था तो दिमाग खाली उस शब्द तक ही सीमित रहता था जिसे विलोम रूप मे देखा जा रहा है। उससे क्या आकार दिमाग मे खुल रहा है वे समझने की दुनिया शायद स्कूल के महकमे नहीं समा पाई।

हमारे जीने के तरीके को समाज अपनी नियमों अनुसार से एक रूप मे कस देता है। जिससे वे हर कदम को तय करता है। कहाँ से निकलेगा और आगे क्या मिलेगा ये तक हमारे कदमो के साथ मे तय होता है।

सही मायने मे तो हमारे शरीर के साथ मे हमारे दिमाग का रिश्ता बेहद टाइट बन जाता है या बना दिया जाता है। बाकि रह गया नज़रिया उसे हम खुद से बनाने की कशिश मे लगे रहते हैं। इसको हम किस रूपक मे देखें? या समाज मे इस बदलते नज़रिये की जरूरत क्या है?

हमारी उस जगह से शुरूआत करते हैं, जहाँ पर हम रहते हैं, जिनसे हमारे रिश्ता है ओर जिनसे हम टकराते हैं।

यहाँ से इस बुनियादी दुनिया को समझने की कोशिश की जा सकती है क्या?

लख्मी

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