Monday, May 18, 2009

बाँटकर गायब हो जाना...

एक बेहद छोटी सी मुलाकात, जिसने कई सवालों को हमारे खोलकर रख दिया। ये शख़्स दक्षिणपुरी के उन लोगों में से हैं जो नितियों को जीने के साथ-साथ उसे बदलने की भावनाओ को खुद में पालते हैं। ज़ोरआज़माइश करते हैं, सवाल पैदा करते हैं लेकिन बाँटकर कहीं गायब हो जाते हैं। ये शहर की रग़ में हैं। इन्हे तलाशकर कहीं खोने के लिए तैयार रह सकते हैं।

आज उन्होनें एक सवाल किया वो बोले, "हम जो भी अपने घर, परिवार और रिश्तेदारों से हटकर करते हैं। वो कुछ भी हो सकता है, चाहें कुछ बनाना, चाहे कुछ लिखना या चाहें कुछ गढ़ना। उसमें जो हम बन जाते हैं या होते हैं क्या वो सदा के लिए हममें उतर जाता है? वो सब कुछ हमारे स्वभाव में कैसे आता है?"

यहाँ पर थोड़ी देर के लिए सब कुछ खामोश हो गया था। इस सवाल के बीच में कोई भी चीज़ न तो तेरी थी और न ही मेंरी। यानि ये सवाल तेरा-मेंरा की दुनिया लेकर नहीं था। वे हम दोनों के ही अन्दर के पहलुओ को छेड़ रहा था।

मैं इस बात को ख़ुद में कई बार सोच चुका हूँ। लेकिन कभी पार नहीं पा पाया। हमारा लेखन या वो अक्श जो हम खुद बनाते हैं लेकिन वो क्या मूरत बन जायेगा वो हमें मालुम नहीं होता। उसका अहसास क्या है वो पहचानते हैं लेकिन उसका अस्तित्व क्या होगा वो नहीं जान पाते। उस दुनिया में हम रहते भी हैं लेकिन सारी दुनिया को उसमें समेंटना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। सारी दुनिया को बना सकते हैं लेकिन सारी दुनिया को खुद में उतारना बेहद मुश्किल हो जाता है। ये सारी दुनिया क्या है? वो दुनिया जो हममें है या वो दुनिया जो हममें होने के बाद भी बाहर है। ये लड़ाई की तरह हमारे ज़हन में दौड़ती रहती है।

अक्सर स्वभाव भारी होता है या पड़ता है। उसका रिश्ता नज़र आती बातों और चीज़ों से बनाया जाता है। कभी-कभी हमारे अन्दरूनी छंद या कल्पनाए स्वभाव की भूमिका बनती हैं मगर उनका दबदबा हरकतों और कहने सुनने के ऊपर ही अटका होता है। स्वभाव शख़्स के नैतृत्व के बहाव से परे होता है तो अन्दाज़ ही उसके पैश होने के तरीको को उजागर करता है।

परिवार, रिश्ते और काम हमें हमारे स्वभाव से परे जाने ही नहीं देते। लगता है जैसे जो भी चीज़ इस दौरान की जा रही है वो हमारे स्वभाव का ही एक हिस्सा बन जाती है। अगर हम हर शख़्स को उसके स्वभाव से आंकने लगेगें तो हमें क्या-क्या नज़र आ सकता है?

वो कहते हैं, "हम जहाँ कुछ बनाते हैं तो उसमें खो जाते हैं। उसमें हर चीज़ को सोचते हैं, कभी-कभी खुद को कोसते भी हैं, उस चीज़ से बिगड़ते हैं मगर कभी उसे तोड़ते नहीं बस, बनाये चले जाते हैं। जब कुछ लिखते हैं तो उसमें बहुत कुछ खूबसूरत बनाने की इच्छा रखते हैं। जिसमें कुछ जान बाकी नहीं होती उसे भी ज़िन्दा मानकर उसके साथ चलने लगते हैं। इसमें कोई भी चीज बेकार नहीं होती। ये हमारी समझ में बसा होता है। पर क्या इस तरह की सोच में जाने का, उतरने का या बहने का कोई वक़्त होता है? हमारी असल ज़िन्दगी और पारिवारिक नितियाँ हमें इससे बाहर खींच लेती हैं या हम खुद ही बाहर आ जाते हैं?"

ये सवाल अपने आपसे टकराने के सवाल थे। जो वो खुद में बुदबुदा रहे थे। शब्दों की ताकत, इच्छा और कल्पना की शक़्ति हमें हमसे कहीं दूर ले जाती है। जिसमें हमें ना तो किसी भी चीज़ का बुरा लगता है और न ही कोई चीज़ बेकार लगती है, न कोई मरा दिखता है ओर न ही कोई अजनबी बना नज़र आता है। ये दुनिया जब हम अपने में रच लेते हैं तो हम कहाँ होते हैं? वही हमारा अपना स्वभाव है। क्या वो दुनिया महज़ रची हुई है जिसके मिटने की कोई तारीख़ है या वो और गहरी होती जाती है? ये हमारे अन्दर के अहसास हैं। जो उससे बाहर नहीं जाना चाहते।

यहाँ पर जैसे एक सवाल को समझने के लिए सवालों की बौछार सी होने लगती है। वो सवाल कितना गहरा है उसकी गहराई नापने का काम यहाँ पर शुरू हो जाता है।

वो बोले, "मुझे अफ़सोस है कि मैं कभी नहीं रह पाता अपने इस रूप में, लेकिन मैं कुछ रचना और गढ़ना कभी बन्द नहीं करता। हाँ इसके दरिया में गोते जरूर लगाता हूँ। गोते लगाकर सबको उसकी छींटों से भिगो देता हूँ उसके बाद बाहर निकल आता हूँ। ऐसा लगता है जैसे कोई धारा या तो मुझे अपने अन्दर खींच लेती है और बहा ले जाती है या फिर कोई मुझे बाहर धकेल देता है। हर बात को, माहौल को और घरेलु नितियों को बहलाने का काम मुझे कसोटने लगता है काम का दरिया जैसे मुखे अपने अन्दर की कल्पनाओ को पैदा नहीं करने देता। मैं ऐसे कभी नहीं कहता की घरेलु नितियों में सम्भावनाये नहीं होती शायद मैं ही नहीं समझ पाता। मेंरी मुलाकात दोबारा उसी कल्पनाओ से जब भी होगी मैं आपके पास जरूर आऊगाँ"

लख्मी

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