Friday, May 8, 2009

जरा नजदिक से..

मेरे एक दोस्त ने कहा, "हमारी पार्टी वालों में मिल जाओ, चलो हमारे साथ आज़ादी के नारे लगाओं।"

पर मैं सोचने लगा की आज़ादी क्या हैं? जिसका नशा मुझ पर चढ़ा है। गर्मियों के मौसम हैं आग आसमान से बरसाती है। कमरे भवक रहे हैं। रेलियों में पसीने से लथपथ लोगों के चेहरे मुर्झाए हैं।

किस की आवाज़ पर ये लोग दौड़ रहे हैं, कौन इनका मसीहा कौन है इनका दूश्मन? बेख़बर हैं। भटक गए हैं जीवन का ये कौन सा ढ़ग हैं। जो एक-दूसरे से घृणा की जा रही है। करूँणा कहाँ गूम है। उदारता कहाँ खो गए?

आज वक़्त ये मजबूरी है की वो अपने आप पर ही रोता है। किसका क्या दोष इसमें, बस आँखों का इक धोका है। इसलिए किस के साथ जाऊँ कुछ मालूम नहीं होता है। जो जीवन मरने के बीच का लोचा है। क्या किसी ने इसके बारे में सोचा है।

राकेश

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