Monday, March 9, 2009

किसी में रंगने का सबब क्या है?

किसी नई जगह को बनाना क्या होता है? एक ऐसी जगह को जो पहले से बनी है? उसमें सबसे ज़्यादा महत्व क्या रखता है? मैं कुछ समय से एक ऐसी के साथ में घुला मिला रहा हूँ। जिसके बनने का कोई निर्धारित वक़्त नहीं होता। शायद कोई ठोस रूप भी नहीं होता। ये कहीं भी बन जाती है। जैसे- कभी गली के बाहर तो कभी सड़क के किनारे तो कभी किसी की छत के ऊपर। बस, इसका बनना तय होता है। जहाँ कुछ लोग मिले वहीं जगह बनने शुरू हो जाती है। इसके अंदर सबसे महत्वपूर्ण बात क्या होती है वे मैंने महसूस किया। वे थी किसी को शख़्स को या बात को, "जगह देना"।

जगह देना, यानि के अपनी ज़िन्दगी के किसी चलते हुए या बितते हुए पल में शामिल करना जिसमें 'शामिल करने' कि क्रिया कोई जोड़ना ही नहीं है। इसमें अपने समय में आते-जाते, ठहरते अहसास में घोलन के समान होता है। एकदम किसी स्वाद की तरह जो चख़ने पर ही महसूस होता है। वो चाहें किसी भी चीज़ का क्यों न हो पर वो स्वाद ही कहलाता है। हम जब चाहें नये या रोज़ होती बातों के समुह में बैठते हैं तो कोई न कोई हमें अपने किस्से सुनाने बैठ जाता है क्यों? एक-दूसरे की कमी को कोई क्यों महसूस करता है? चाहें कोई करीब न हो पर उसे अपने नज़दीक ही महसूस करता है। हक़ीकत की बनी ठोस तस्वीर के फ्रेम में कल्पना की उड़ानो के रंग क्यों भरता है? इसका मतलब ये नहीं होता की इस अहसास ने किसी को ख़ास बना दिया है या उसे हमारे सामने कोई कुर्सी दे दी है। बल्कि ये तो एक घुलनसील नमी है। जो हम अक्सर अपने कानों के पास ही महसूस करते हैं। जिसमें 'शामिल होना' एक हिस्सा नहीं बनता बल्कि एक साथ चलने वाला साथी बन जाता है। जिसका होना उस रूप की तरह होता है जो कदम पर कदम रखकर उसे दो नहीं करता बस, उसका आकार बड़ा कर देता है। जिसकी दूरी और नज़दीकी को हम अपने से तैयार करते हैं।

ऐसा ही कुछ हाल-फिलहाल में हुआ। किसी एक नई जगह को रूप मे लाना जिसका आकार तो समझ में आता है पर रूप क्या होगा? ये तय कर पाना बेहद मुश्किल बन जाता है। गली के बाहर लगने वाले माहौल, बनकर टूट जाने वाले माहौल, सड़कों से गुज़रते लोगों के चेहरों मे खो जाने वाले माहौल और बातों ही बातों मे हर रोज़ मिलने वाले माहौल। हमारे लिए ये महज़ जगह नही होते। इसे एक सदंर्भ मानकर हम अक्सर चलते हैं। जो 'जगह' पहले से ही अपने मजबूत ढाँचों और इरादों पर टिकी हो, उसमे अपने आपको रखकर एक नया सदंर्भ बनाना बेहद मज़ेदार होता है। मगर, जब किसी बड़े से माहौल में हम कोई नया सदंर्भ बनाते हैं तो क्या होता है? उस सदंर्भ के लिए और उस बड़े माहौल के लिए?

ये सवाल ख़ुद के लिए कभी-कभी कुछ नई राहें खोल देता है। इन जगहों के बारे में महसूस करें तो इसमें एक चाहत होती है। जो लोगों, अनुभवों को साधकर रखती है। जैसे- किसी पेज का मार्जिन करना। वो पेज के हिस्से नहीं करता या किसी भाग को अलग नहीं करता बल्कि वो अंदर आते हर शब्द, लाइन और तस्वीर को साध देता है। उसका साधना उसे एक फ्रेम दे देता है जिससे कुछ भी बिख़रा सा नहीं लगता। उसी में एक सामान्य रूप नज़र आता है। जिसका बैलेन्स और लेवल एक साँचे मे ढलकर एक मूरत के जैसा इख़्तयार होकर ख़ुद को पेश करता है। ये जो माहौल हैं जो हमारे आसपास कहीं भी, कभी भी बने नज़र आते हैं इन्ही में कई सारी ज़िन्दगियाँ, खूबसूरत पलों में दोहराई जाती हैं। कहीं चलते रास्तों पर, कहीं ठहरते चौंबारों पर, कहीं बस की उछलती सीटों पर, कहीं गली या आंगन में। ये हमारी आँखों मे बस, गए हैं। जो कभी-कभी ज़िन्दगी के अनुभव में गिने जाते हैं।

इन्ही की तरह अपने ख़ुद को भी एक नये तरीके से एक नई छवि मिलती है। उसी जगह पर जो पहले से बनी है। लेकिन उस नये संदर्भ में लोगों का मान-भाव कैसे हो? और वो अपने को कहाँ और कैसे महसूस करें? जहाँ एक ऐसा माहौल है की लोग एक जुट में आते-जाते हैं। उनका रहना, खाना, चलना, हँसना और पूरे दिन को एक ही साथ बिताना चलता है जिनका पूरा दिन 45-45 मिनट के हिस्सों में बँटा है जिसमें वो अपने लिए सीखने का एक समाज लिए जी रहे होते हैं। अपने हाथ के हुनर को लेकर ही अपने आने वाले कल की कल्पना करते हैं। हर रोज़ अपने कई साथियो के साथ में रहना, बोलना, गाना और अपने कपड़े शेयर करने बाद भी जब अपने भष्विय की बात करते हैं तो एकदम अकेले हो जाते हैं बस, इन रिश्तों को ऐसा बना देते हैं कि ये साधन हैं ज़िन्दगी को बिताने और हरा-भरा करने के।

रिश्तों की कतार में खड़े हम कहाँ-कहाँ नज़र मारते हैं? जहाँ से हम कुछ चुन सकें। इतना तो पता है की कुछ रिश्ते हमें तोहफे में मिलते हैं जो इंसान का अकेलापन दूर करने के लिए होते हैं। कहा जाता है कि हम बचपन में जिस-जिस कि गोद में जाते हैं उनसे हमारा एक रिश्ता बना होता है पर कुछ रिश्ते हम ख़ुद से बनाते हैं। वो रिश्ते होते है तोहफे। जो हम हर रोज़ बनाते हुए चलते हैं। तो इन रिश्तों का और लोगों के अनुभव में हम अपने को कहाँ तलाश सकते हैं? या शामिल हो सकते हैं?

अगर ये बात किसी जगह पर निर्भर करती है तो, हर जगह अपने साथ कुछ शर्ते लेकर जीती है पर यहाँ नहीं होगी। माहौल बन जाना अपने आपमें बहुत मायने रखता है। उसमे हम कई सारे अनुभवों के बीच बैठे होते हैं जिनमें कई पल, रिश्ते, रास्ते, गलियाँ, पड़ोसी, यादें, निशानियाँ होती है। अपने अनुभव से बाहर निकलकर बाकी अनुभवों को अपने में उतारना अलग-अलग अनुभव जिनमें अपना-अपना रंग है और हमारा एक अनुभव जिसका अपना भी एक रंग है तो हमें उन सब रंगो में देखना होता है कि वो कौन सा रंग है जो सबमें "कोमन यानि एक जैसा है" क्योंकि अपने रंग मे ढ़ालने से ज़्यादा जरुरी होता है उनके रंगो मे ढ़लकर एक माहौल को बनाना और फिर उन्ही रंगो कि रंगिनियत को वापस उसी माहौल में पेश करना। क्योंकि मैं खाली अपना-अपना अनुभव ही शेयर करने नहीं आया हूँ बल्कि मैं कई सारे अनुभवों को एक साथ जी रहा हूँ जिसे मैं नाकार नहीं सकता। उनमें घूम रहे किसी ख़ास रिश्ते में बैठा हूँ और उनके बने रंग उभारता है। उसे वापस रखा जाता है। एक ही चीज़ है जिसे हर शख़्स निभाता आया है।

शहर के बड़े अनुभवी और उम्रदराज़ शख़्स ये बात अक्सर कहते हैं, गर किसी शख़्स या माहौल से रिश्ता बनाना हो तो, दो चीज़ों में एक चीज़ को अपनाओ, या तो उसके रंग मे घुल जाओ या फिर उसे अपने रंग में घोल लो।

लख्मी

3 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

एक शहर में हम यही सब सीखते हैं और आगे निकल जाते है। स्पेस देने और लेन की बात को ही हम आगे बढ़ाते हैं। जैसा कि आपने कहा कि या तो उसके रंग मे घुल जाओ या फिर उसे अपने रंग में घोल लो।

फिर मिलते हैं।

शुक्रिया

Ek Shehr Hai said...

आपका स्वागत है।

दोस्त गिरीन्द्र,
आपने बेहद सही कहा, लेकिन मैं आपके कहने मे एक बेहद दिलचश्प बात को समझने की कोशिश कर पाया।

आपका कहना, "एक शहर में हम यही सब सीखते हैं और आगे निकल जाते है। स्पेस देने और लेन की बात को ही हम आगे बढ़ाते हैं।"

ये "आगे निकल जाना" और "आगे बढ़ जाना" ये बेहद दिलचश्प हो सकेगा हमारी सोच के लिए।

शुक्रिया

Ek Shehr Hai said...
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