Thursday, December 18, 2008

भूख है, ये नहीं कोई जादू

मानव को इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया
किसी को भिखारी तो किसी को अफ़लातून बना दिया
जब गिरा जाकर इतिहास के टोकरे में
तब रीमिक्स कहकर यादों को दोगला बना दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

वो कोई और थे जो विरासतें बनाकर छोड़ गए
अब तो नंगापन भी आदमी को भा गया
इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

कहत कबीर सुनों भई साधू
भूख है, ये नहीं कोई जादू
इस की फ़ितरत ने अपना पर्चम चट्टानों पर लहरा दिया
सीना ठोक कर जो वादा किया, वो वादा निभा दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

फैशन पर फ़िदा दुनिया सारी
जिसको देखो कपड़े फाड़ने की लगी बिमारी
इस बिमारी ने लाखों को मार्ग से भटका दिया
रात की आगोश ने तुझको अकेला चमकता जुगनू बना दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

याद है मुझे अभी भी वो मैख़ाने
जिसमें कभी तहज़ीब से पिया जाता था
अब तो तहज़ीब से पीने का नाम ही बचा है बस,
पीने वालों ने ही शराब को बदनाम करा दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

नशा नहीं कहता की तू मुझे पीकर बहक जा
अब तो पीने वालों ने ही नशे को ठुकरा दिया
बस, बचा है एक नाम नशा
क्योंकि बेवड़ों ने इस सब्र का नामों निशाँ मिटा दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

कटोरा लिए जो फिरता है आज
वो कभी युवराज हुआ करता था
उछालता है कीचड़ जो औरों पर
वो भी कभी साफ़-सुथरा हुआ करता था
अब चमक नहीं उसके प्यालों में तो रोता है
उस ने अपनी दुनिया को अपने हाथों से जला दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

आज दिल्ली बन गई मैट्रो सिटी
बेगुनहा जनता महंगाई के हाथों पिटी
कर्जे में डूबकर भी हुकूमत ने विकास दिखा दिया
गरीबों के दामन और फ़टे बस, अमीरों पर जरा सा टेक्स लगा दिया

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

राकेश

2 comments:

परमजीत बाली said...

इस भूख ने क्या-क्या न बना दिया

बहुत बढिया है।

Ek Shehr Hai said...

दोस्त आपका एक शहर है ब्लॉग पर स्वागत है।
काफी वक़्त गुज़र जाने के बाद मैं आप लोगों से मिल रहा हूँ।

इन दिनों दिल्ली की एक बस्ती जिसका नाम एल.एन.जे.पी है। यहाँ पर सर्वे चल रहे हैं शायद दो-तीन महिने का सफ़र और बाकी है। हम उसके हर पल में शामिल है और को भी इस सफ़र में शामिल होने का न्यौता देते हैं।